google.com, pub-8725611118255173, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Shree Krishna Quotes in Sanskrit - 2024

Shree Krishna Quotes in Sanskrit

Shree Krishna Quotes in Sanskrit

krishna quotes in sanskrit

श्री कृष्ण को उनके भक्त कई नामों से पुकारते हैं, जिनमें नंदलाल कन्हैया, माखनचोर, गोपाल आदि प्रमुख है। ऐसा कहा जाता है कि श्री कृष्ण का कलयुग में महात्म्य और बढ़ने वाला है।यहां पर हम श्री कृष्ण श्लोक हिंदी अर्थ सहित (कृष्णं वंदे जगत गुरुं:गीता के ये हैं टॉप 10 श्लोक) शेयर करने जा रहे हैं। इन कृष्ण संस्कृत श्लोक (कृष्ण मंत्र श्लोक – Krishna Mantra & Krishna Sloka) को पढ़ने के बाद आप श्री कृष्ण को और अधिक समझ सकेंगे।

Shree Krishna Quotes in Sanskrit, वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।|

meaning

मैं वासुदेवानंदन जगद्गुरु श्री कृष्ण चंद्र को नमन करता हूं,
जिन्होंने कंस और चानूर को मार डाला, देवकी का आशीर्वाद।

अतः सत्यं यतो धर्मो मतो हीरार्जवं यतः। ततो भवति गोविन्दो यतः कृष्णस्ततो जयः।।

अतः सत्यं यतो धर्मो मतो हीरार्जवं यतः।
ततो भवति गोविन्दो यतः कृष्णस्ततो जयः।।

meaning

जहां सत्य, धर्म, लज्जा और सरलता का वास है
वहां श्रीकृष्ण निवास करते हैं और जहां श्रीकृष्ण निवास करते हैं,
वहां विजय का वास होता है।

पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च पुरुषोत्तमः। विचेष्टयति भूतात्मा क्रीडन्निव जनार्दनः।।

पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च पुरुषोत्तमः।
विचेष्टयति भूतात्मा क्रीडन्निव जनार्दनः।।

meaning

वे सर्वंतरीमी पुरुषोत्तम जनार्दन हैं, मानो वे खेल के माध्यम से पृथ्वी,
आकाश और स्वर्गीय दुनिया को प्रेरित कर रहे हैं।

वृन्दावनेश्वरी राधा कृष्णो वृन्दावनेश्वरः। जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम।।

वृन्दावनेश्वरी राधा कृष्णो वृन्दावनेश्वरः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम।।

meaning

श्रीराधारानी वृंदावन की स्वामिनी हैं और श्री कृष्ण वृन्दावन के स्वामी,
मेरे जीवन का-शोक श्रीराधा-कृष्ण के सहायक में हो।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युथानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युथानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

meaning

हे भरत के वंशज, जब भी और जहां भी धार्मिक आचरण में गिरावट आती है और अधर्म का बोलबाला होता है,

उस समय मैं स्वयं अवतरित होता हूं।

Shree Krishna Quotes in Sanskrit,

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नम: ||

meaning

हे कृष्ण, वासुदेव, हरि, परमात्मा! दुखों के विनाशक गोविंदा को नमस्कार:

“कृष्णप्रेममयी राधा राधाप्रेममयो हरिः। जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम।।”

“कृष्णप्रेममयी राधा राधाप्रेममयो हरिः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम।।”

meaning

“राधा कृष्ण के प्रति प्रेम से परिपूर्ण है और हरि राधा के प्रति प्रेम से परिपूर्ण हैं।
जीवन और धन में मेरी मंजिल सदैव राधाकृष्ण ही है।”

“कृष्णचित्तस्थिता राधा राधाचित्स्थितो हरिः। जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम।।”

“कृष्णचित्तस्थिता राधा राधाचित्स्थितो हरिः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम।।”

meaning

“राधा कृष्ण के मन में स्थित हैं और हरि राधा के मन में स्थित हैं।
जीवन और धन में मेरी मंजिल सदैव राधाकृष्ण ही है।”

“कृष्णस्य द्रविणं राधा राधायाः द्रविणं हरिः। जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम।।”

“कृष्णस्य द्रविणं राधा राधायाः द्रविणं हरिः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम।।”

meaning

भगवान श्रीकृष्ण की पूर्ण-सम्पदा श्रीराधारानी हैं। श्रीराधारानी का पूर्ण-धन श्रीकृष्ण हैं। इसलिए मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण श्रीराधा- कृष्ण के आश्रय में गुजरे।

“नीलाम्बरा धरा राधा पीताम्बरो धरो हरिः। जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम।।”

“नीलाम्बरा धरा राधा पीताम्बरो धरो हरिः।
जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम।।”

meaning

श्रीराधारानी नीलवर्ण के वस्त्र धारण करती हैं। भगवान श्रीकृष्णपीतवर्ण के वस्त्र धारण करते हैं। इसलिए मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण श्रीराधा- कृष्ण के आश्रय में गुजरे।

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

“जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।

तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥”

meaning

क्योंकि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इसलिये तुम्हें इस अपरिहार्य विषय पर शोक नहीं करना चाहिये।

Reference: live Hindustan.

                                     यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |

                                     अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्

                                                        meaning

    जब भी धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, उस समय मैं स्वयं पृथ्वी पर प्रकट होता हूं

                                अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।

                                 यः प्रयाति स मुद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः

                                                     meaning

                    वे जो शरीर त्यागते समय मेरा स्मरण करते हैं, वे मेरे पास आएँगे।

                                  कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |

                                 मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ||

                                                        meaning

                      तुम्हें अपने निश्चित कर्मों का पालन करने का अधिकार है लेकिन तुम                                     अपने कर्मों का फल प्राप्त करने के अधिकारी नहीं हो,

                                                 अर्जुन उवाच।

                             स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।

                                 स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत

                                                  meaning

              अर्जुन ने कहाः हे केशव! दिव्य चेतना में लीन वह सिद्ध पुरुष कैसे बोलता है?                                                   कैसे बैठता है और कैसे चलता है?

                                    यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।

                                 सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥4॥

                                                        meaning

  जब कोई मनुष्य न तो इन्द्रिय विषयों में और न ही कर्मों के अनुपालन में आसक्त होता है      और कर्म फलों की सभी इच्छाओं का त्याग करने के कारण ऐसे मनुष्य को योग मार्ग में                                                  आरूढ़ कहा जाता है।

                              बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।

                           वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥19॥

                                                   meaning

अनेक जन्मों की आध्यात्मिक साधना के पश्चात जिसे ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वह मुझे सबका उद्गम जानकर मेरी शरण ग्रहण करता है। ऐसी महान आत्मा वास्तव में अत्यन्त दुर्लभ होती है।

                               तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।

                             मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥7॥

                                                  meaning

इसलिए सदा मेरा स्मरण करो और युद्ध लड़ने के अपने कर्त्तव्य का भी पालन करो, अपना मन और बुद्धि मुझे समर्पित करो तब तुम निचित रूप से मुझे पा लोगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।

                                   धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।

                              मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥

                                                  meaning

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में एकत्रित होकर युद्ध करने की इच्छा रखने वाले मेरे (कौरव) और पाण्डवों में क्या युद्ध हो रहा है हे संजय?

                                   कथं न जानेंयं युद्धेष्प कर्म चाकर्म च ।   

                             एवं सत्यपरो भारता स मुहूर्तोऽविगच्छति ॥   

                                                       meaning

जो व्यक्ति श्रेष्ठ कर्म करता है, सत्य की राह पर चलता है, लोगों को उन्हीं का अनुसरण करना चाहिए।

                              लोके ‘स्मिन् द्वि-विधा निष्ठा पूर्वोक्ता मया अर्जुन ।     

                              ज्ञान-योगेन सन्यासः कर्म-योगेन च अन्ये ॥

                                                  meaning

श्री भगवान कहते हैं – हे अर्जुन! मैंने पहले ही इस संसार में आत्मज्ञान की प्राप्ति के दो मार्गों का वर्णन कर दिया है। ज्ञानयोग उन मनुष्यों के लिए है जिनकी रुचि चिंतन में होती है और कर्मयोग उनके लिए है जिनकी रुचि कर्म करने में होती है।

                     न कर्मणा मयोज्ययो न वा ज्ञानेन तपसा ज्ञानं लब्ध्वा च 

                                         कर्म च कृत्वार्जुन् योगं समारभ ॥

                                                    meaning

अर्जुन कहते हैं – हे भगवान! आपका जन्म और आपके पिछले जन्म, और सूर्य देव विवस्वान के जन्म को लेकर मैं भ्रमित हूँ। आपने मुझे यह ज्ञान तो बहुत पहले ही दिया था, फिर मैं इसे कैसे जान सकता हूँ?

                                     परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |

                                 धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

                                                      meaning

परित्रणाय-रक्षा के लिए; साधूनाम्-भक्तों का; विनाशाय-संहार के लिए; च-और; दुष्कृताम्-दुष्टों के; धर्म-शाश्वत धर्म; संस्थापन-अर्थाय-पुनः मर्यादा स्थापित करने के लिए; सम्भवामि-प्रकट होता हूँ; युगे युग; युगे–प्रत्येक युग में।

                               अथ चेतत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि |

                              तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ||

                                                       meaning

यदि फिर भी तुम इस धर्म युद्ध का सामना नहीं करना चाहते तब तुम्हें निश्चित रूप से अपने सामाजिक कर्तव्यों की उपेक्षा करने का पाप लगेगा और तुम अपनी प्रतिष्ठा खो दोगे।

                              यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।

                               भुज्यते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥

                                                   meaning

आध्यात्मिक मनोवत्ति वाले जो भक्त पहले यज्ञ में अर्पित करने के पश्चात भोजन ग्रहण करते हैं, वे सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं किन्तु जो अपनी इन्द्रिय तृप्ति के लिए भोजन बनाते हैं, वे वास्तव में पाप अर्जित करते हैं।

                           वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्वाति नरोऽपराणि।

                       तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

                                                     meaning

जिस प्रकार से मनुष्य अपने फटे पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा पुराने तथा व्यर्थ शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण करती है।

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